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ममे॒यम॑स्तु॒पोष्या॒ मह्यं॑ त्वादा॒द्बृह॒स्पतिः॑। मया॒ पत्या॑ प्रजावति॒ सं जी॑व श॒रदः॑श॒तम् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

मम । इयम् । अस्तु । पोष्या । मह्यम् । त्वा । अदात् । बृहस्पति: । मया । पत्या । प्रजाऽवति । सम् । जीव । शरद: । शतम् ॥१.५२॥

अथर्ववेद » काण्ड:14» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:52


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

विवाह संस्कार का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (इयम्) यह [पत्नी] (मम) मेरे (पोष्या) पोषणयोग्य (अस्तु) होवे, (मह्यम्) मुझको (त्वा) तुझे (बृहस्पतिः) बड़े लोकों के स्वामी [परमात्मा] ने (अदात्) दिया है। (प्रजावति) हेश्रेष्ठ प्रजावाली ! तू (मया पत्या) मुझ पति के साथ (सम्) मिलकर (शतम्) सौ (शरदः) वर्षों तक (जीव) जीती रहे ॥५२॥
भावार्थभाषाः - पति को योग्य है किवस्त्र, अलंकार आदि पदार्थों से पत्नी का सन्मान करता रहे, जिससे दम्पती प्रसन्नरहकर सन्तान आदि का पालन-पोषण करते हुए पूर्ण आयु भोगें ॥५२॥
टिप्पणी: ५२−(मम) (इयम्)पत्नी (अस्तु) (पोष्या) पोषणीया (मह्यम्) पत्ये (त्वा) त्वां पत्नीम् (अदात्)दत्तवान् (बृहस्पतिः) बृहतां लोकानां पालकः परमात्मा (मया) (पत्या) भर्त्रा (प्रजावति) हे सन्तानसेवकादियुक्ते (सम्) मिलित्वा (जीव) प्राणान् धारय (शरदः)वर्षाणि (शतम्) ॥