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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विवाह संस्कार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (भगः) ऐश्वर्यवान् [परमात्मा] ने (ते) तेरा (हस्तम्) हाथ (अग्रहीत्) पकड़ा है [सहाय किया है], (सविता) सर्वोत्पादक जगदीश्वर ने (हस्तम्) हाथ (अग्रहीत्) पकड़ा है। (धर्मणा)धर्म से, (त्वम्) तू (पत्नी) [मेरी] पत्नी [पालन करनेवाली] (असि) है, (अहम्) मैं (तव) तेरा (गृहपतिः) गृहपति [घर का पालन करनेवाला हूँ] ॥५१॥
भावार्थभाषाः - पति-पत्नी दृढ़प्रतिज्ञा करें कि परमेश्वर के अनुग्रह से हम दोनों मिले हैं, हम दोनों मिलकरगृहाश्रम में धर्ममार्ग पर चलेंगे और परस्पर सहाय करेंगे ॥५१॥
टिप्पणी: ५१−(भगः)ऐश्वर्यवान् परमात्मा (ते) तव (हस्तम्) (अग्रहीत्) गृहीतवान् (सविता)सर्वोत्पादको जगदीश्वरः (हस्तम्) (अग्रहीत्) (पत्नी) पालयित्री (त्वम्) (असि) (धर्मणा) शास्त्रविहितकर्मणा (अहम्) (गृहपतिः) गृहस्वामी (तव) ॥
