पदार्थान्वयभाषाः - (नरः) नर [नेता लोग] (जीवम्) [संसार के] जीवन के लिये [प्रेम से] (रुदन्ति) आँसू बहाते हैं, (अध्वरम्) हिंसारहित व्यवहार को (वि) विविध प्रकार (नयन्ति) ले चलते हैं, और (दीर्घाम्) लम्बी (प्रसितिम् अनु) प्रबन्ध क्रिया के साथ (दीध्युः) प्रकाशमानहोते हैं। (ये) जिन [पुरुषार्थियों] ने (पितृभ्यः) पिता आदि मान्य लोगों के लिये (इदम्) यह (वामम्) श्रेष्ठ पदार्थ (समीरिरे) पहुँचाया है, (पतिभ्यः) उन रक्षकपुरुषों के लिये [पति से] (जनये परिष्वजे) पत्नी का मिलना (मयः) सुखदायक है ॥४६॥
भावार्थभाषाः - करुणाशील, शूरवीरपुरुष गृहाश्रम में हिंसा त्यागकर दृढ़ प्रबन्ध करके यश पाते हैं। जो मनुष्य इसश्रेष्ठ सिद्धान्त को विद्वानों में फैलाते हैं, वे विद्वान् गृहाश्रमी स्त्री-पुरुषों से विद्यावृद्धि में सुख पाते हैं ॥४६॥यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद मेंहै−१०।४०।१०, और महर्षिदयानन्दकृत संस्कारविधि विवाहप्रकरण में वधू को पितृ-गृह छोड़ते समय आँख में आँसू भर लाने पर वर के बोलने में लिखा है ॥