0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विवाह संस्कार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जैसे (वृषा)बलवान् (सिन्धुः) समुद्र ने (नदीनाम्) नदियों का (साम्राज्यम्) साम्राज्य [चक्रवर्ती राज्य, अपने लिये] (सुषुवे) उत्पन्न किया है। [हे वधू !] (एव) वैसेही (त्वम्) तू (पत्युः) पति के (अस्तम्) घर (परेत्य) पहुँचकर (सम्राज्ञी)राजराजेश्वरी [चक्रवर्ती रानी] (एधि) हो ॥४३॥
भावार्थभाषाः - बड़े लोगों की शिक्षाऔर आशीर्वाद से वधू सावधानी के साथ घर के सबकामों को अपने हाथ में लेकर महारानीबनकर रहे ॥४३॥
टिप्पणी: ४३−(यथा) येन प्रकारेण (सिन्धुः) समुद्रः (नदीनाम्) सरिताम् (साम्राज्यम्) सार्वभौमत्वम्। चक्रवर्तिराज्यम् (सुषुवे) उत्पादयमास (वृषा)बलवान् (एव) तथा (त्वम्) (सम्राज्ञी) राजराजेश्वरी (एधि) भव (पत्युः) (अस्तम्)गृहम् (परेत्य) प्राप्य ॥
