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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विवाह संस्कार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे वधू !] (सौमनसम्)मन की प्रसन्नता, (प्रजाम्) प्रजा [सन्तान, सेवक आदि], (सौभाग्यम्) बड़ीभाग्यवाली और (रयिम्) धन को (आशासमाना) चाहती हुई तू (पत्युः) पति के (अनुव्रता)अनुकूल कर्मवाली (भूत्वा) होकर (अमृताय) अमरपन [पुरुषार्थ और कीर्ति] के लिये (कम्) सुख से (सं नह्यस्व) सन्नद्ध होजा [युद्ध के लिये कवच धारण कर] ॥४२॥
भावार्थभाषाः - सब कुटुम्बी लोग वधूको शिक्षा दें कि वह विदुषी वधू योग्यता के साथ पति से प्रीति करकेप्रसन्नतापूर्वक गृहकार्यों को सिद्ध करे ॥४२॥
टिप्पणी: ४२−(आशासमाना) कामयमाना (सौमनसम्)मनःप्रसादम् (प्रजाम्) सन्तानसेवकादिरूपाम् (सौभाग्यम्) सुभगत्वम् (रयिम्) धनम् (पत्युः) स्वामिनः (अनुव्रता) व्रतं कर्मनाम-निघ० २।१। अनुकूलकर्मा (भूत्वा) (संनह्यस्व) सन्नद्धा भव। सन्नाहं युद्धाय कवचं धारय (अमृताय) अमरणाय।पुरुषार्थाय कीर्त्तये च (कम्) सुखेन ॥
