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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मन्त्र १-५, प्रकाश करने योग्य और प्रकाशक के विषय काउपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सोमम्) चन्द्रमा [केअमृत] को (पपिवान्) मैंने पी लिया, [यह बात मनुष्य] (मन्यते) मानता है, (यत्) जब (ओषधिम्) ओषधि [अन्न, सोमलता आदि] को (संपिषन्ति) वे [मनुष्य] पीसते हैं। (यम्)जिस (सोमम्) जगत्स्रष्टा परमात्मा को (ब्रह्माणः) ब्रह्मज्ञानी लोग (विदुः)जानते हैं, (तस्य) उसका [अनुभव] (पार्थिवः) पृथिवी [के विषय] में आसक्त पुरुष (न) नहीं (अश्नाति) भोगता है ॥३॥
भावार्थभाषाः - चन्द्रमा से पुष्टहुए अन्न सोमलता आदि के सेवन से मनुष्य शरीरपुष्टि करते हैं, परन्तु जो मनुष्यविद्वानों का सत्सङ्ग करके ईश्वरज्ञान से आत्मा को पुष्ट करते हैं, वे शरीरपोषकों की अपेक्षा अधिक आनन्द पाते हैं ॥३॥
टिप्पणी: ३−(सोमम्) चन्द्रामृतम् (मन्यते)जानाति (पपिवान्) पा पाने-क्वसु। अहं पीतवानस्मि (यत्) यदा (संपिंषन्ति) सम्यक्चूर्णीकुर्वन्ति (ओषधिम्) अन्नसोमलतादिकम् (सोमम्) जगत्स्रष्टारं परमात्मानम्, (यम्) (ब्रह्माणः) ब्रह्मज्ञानिनः पुरुषाः (विदुः) जानन्ति। साक्षात्कुर्वन्ति (न) निषेधे (तस्य) ब्रह्मणोऽनुभवम् (अश्नाति) भुनक्ति। अनुभवति (पार्थिवः)पृथिवीविषयाऽऽसक्तः पुरुषः ॥
