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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विवाह संस्कार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (रुशती) चमकता हुआ (तनूः) रूप (अमुया) उस (पापया) पाप क्रिया से (अश्लीला) अश्लील [हतश्री] (भवति)हो जाता है, (यत्) जब कि (पतिः) पति (वध्वः) वधू के (वाससः) वस्त्र से (स्वम्अङ्गम्) अपने अङ्ग को (अभ्यूर्णुते) ढक लेता है ॥२७॥
भावार्थभाषाः - जब पति पुरुषार्थछोड़कर कुकामी होकर बुरी स्त्रियों के समान कुचेष्टा करता है, तब उसदुर्बलेन्द्रिय का रूप बिगड़ जाता है और वह लज्जा को प्राप्त होता है ॥२७॥यहमन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१०।८५।३० ॥
टिप्पणी: २७−(अश्लीला) श्रीरहिता। कुरूपा (तनूः) रूपम् (भवति) (रुशती) रोचमाना (पापया) पापबुद्धया (अमुया) प्रसिद्धया (पतिः) (यत्) यदा (वध्वः) पत्न्याः (वाससः) वस्त्रात् (स्वम्) स्वकीयम् (अङ्गम्)(अभ्यूर्णुते) आच्छादयति ॥
