0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विवाह संस्कार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (नीललोहितम्) निधियोंका प्रकाश (भवति) होता है, [जब कि] (कृत्या=कृत्यायाः) कर्तव्यकुशल [पत्नी] की (आसक्तिः) प्रीति (वि अज्यते) प्रसिद्ध होती है। (अस्याः) इस [वधू] के (ज्ञातयः)कुटुम्बी लोग (एधन्ते) बढ़ते हैं, और (पतिः) पति (बन्धेषु) [वधू के साथ प्रेम के]बन्धनों में (बध्यते) बँध जाता है ॥२६॥
भावार्थभाषाः - जिस कुल में कर्मकुशलबुद्धिमती स्त्री धन का लाभ व्यय आदि विचारकर कर्तव्य करती है, वहाँ धन सम्पत्तिबढ़ती है। उसकी समृद्धि से माता-पिता आदि और सब कुटुम्बी वृद्धि करते हैं और पतिउससे हार्दिक प्रीति करता है ॥२६॥यह मन्त्र ऋग्वेद में है−१०।८५।२८ ॥
टिप्पणी: २६−(नीललोहितम्)नि+इल गतौ-क+रुहेश्च लो वा। उ० ३।९४। रु प्रादुर्भावे-इतन्, रस्य लः। नीलानांनिधीनां प्रादुर्भावः (भवति) (कृत्या) म० २५। सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९।षष्ठीस्थाने प्रथमा। कृत्यायाः कर्तव्यकुशलायाः पत्न्याः (आसक्तिः) प्रीतिः (व्यज्यते) अञ्जू व्यक्तीकरणे। व्यक्तीक्रियते। प्रसिद्धिं गच्छति (एधन्ते)वर्धन्ते (अस्याः) वध्वाः (ज्ञातयः) सगोत्राः (पतिः) (बन्धेषु) प्रेमपाशेषु (बध्यते) बद्धो भवति ॥
