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पू॑र्वाप॒रंच॑रतो मा॒ययैतौ शिशू॒ क्रीड॑न्तौ॒ परि॑ यातोऽर्ण॒वम्। विश्वा॒न्यो भुव॑नावि॒चष्ट॑ ऋ॒तूँर॒न्यो वि॒दध॑ज्जायसे॒ नवः॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पूर्वऽअपरम् । चरत: । मायया । एतौ । शिशू इति । क्रीडन्तौ । परि । यात: । अर्णवम् । विश्वा । अन्य: । भुवना । विऽचष्टे । ऋतून् । अन्य: । विऽदधत् । जायसे । नव: ॥१.२३॥

अथर्ववेद » काण्ड:14» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:23


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

विवाह संस्कार का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (एतौ) यह दोनों [सूर्य, चन्द्रमा] (पूर्वापरम्) आगे-पीछे (मायया) बुद्धि से [ईश्वरनियम से] (चरतः) विचरते हैं, (क्रीडन्तौ) खेलते हुए (शिशू) दो बालक [जैसे] (अर्णवम्)अन्तरिक्ष में (परि) सब ओर (यातः) चलते हैं। (अन्यः) एक [सूर्य] (विश्वा) सब (भुवना) भुवनों को (विचष्टे) देखता है, (अन्यः) दूसरा तू [चन्द्रमा] (ऋतून्)ऋतुओं को [अपनी गति से] (विदधत्) बनाता हुआ [शुक्ल पक्ष में] (नवः) नवीन (जायसे)प्रकट होता है ॥२३॥
भावार्थभाषाः - सूर्य और चन्द्रमाआकाश में घूमते हैं। चन्द्र आदि लोकों को सूर्य प्रकाश पहुँचाता है। चन्द्रमाशुक्लपक्ष में एक-एक कला बढ़ता और वसन्त आदि ऋतुओं को बनाता है। हे स्त्री-पुरुषो ! जैसे यह सूर्य-चन्द्रमा ईश्वरनियम पर चलकर संसार का उपकार करते हैं, वैसे ही तुम दोनों उपकार करो ॥२३॥मन्त्र २३, २४ कुछ भेद से ऋग्वेद में हैं−१०।८५।१८, १९ और ऊपर आ चुके हैं-अ० ७।८१।१, २, तथा मन्त्र २३ के तीन पद फिर आयेहैं-अ० १३।२।११ ॥
टिप्पणी: २३−अयं मन्त्रोव्याख्यातः-अ० ७।८१।१ ॥