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प्रेतोमु॑ञ्चामि॒ नामुतः॑ सुब॒द्धाम॒मुत॑स्करम्। यथे॒यमि॑न्द्र मीढ्वः सुपु॒त्रासु॒भगास॑ति ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । इत: । मुञ्चामि । न । अमुत: । सुऽबध्दाम् । अमुत: । करम् । यथा । इयम् । इन्द्र । मीढ्व: । सुऽपुत्रा: । सुऽभगा । असति ॥१.१८॥

अथर्ववेद » काण्ड:14» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:18


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

विवाह संस्कार का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (इतः) इस [वियोगपाश]से [इस वधू को] (प्र मुञ्चामि) मैं [वर] अच्छे प्रकार छुड़ाताहूँ, (अमुतः) उस [प्रेमपाश] से (न) नहीं [छुड़ाता], (अमुतः) उस [प्रेमपाश] में [इस वधू] को (सुबद्धाम्) अच्छे बन्धनयुक्त (करम्) मैं करता हूँ। (यथा) जिस से (मीढ्वः) हेसुख की वर्षा करनेवाले (इन्द्र) परम ऐश्वर्यवाले परमात्मन् ! (इयम्) यह [वधू] (सुपुत्रा) सुन्दर पुत्रोंवाली और (सुभगा) बड़े ऐश्वर्यवाली (असति) होवे ॥१८॥
भावार्थभाषाः - वधू-वर को चाहिये किआपस में बड़े प्रेम का बरताव करें, और परमात्मा की उपासना करके प्रयत्नपूर्वकघर में श्रेष्ठ सन्तान और ऐश्वर्य प्राप्त करके दोनों आनन्दित रहें ॥१८॥मन्त्र१८, १९ ऋग्वेद में कुछ भेद से हैं−१०।८५।२५, २४ और दोनों मन्त्र महर्षिदयानन्दकृत संस्कारविधि विवाहप्रकरण में उद्धृत हैं और विनियोग इस प्रकार है कि वर इनदोनों मन्त्रों को बोलकर वधू के बँधे हुए केशों को छोड़े ॥
टिप्पणी: १८−(प्र) प्रकर्षेण (इतः) अस्मात्। वियोगपाशात् (मुञ्चामि) मोचयामि (नः) निषेधे (अमुतः) तस्मात्।प्रेमपाशात् (सुबद्धाम्) सुष्ठु बन्धनयुक्ताम् (अमुतः) तस्मिन्। प्रेमपाशे (करम्) करोमि (यथा) येन प्रकारेण (इयम्) वधूः (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन्परमात्मन् ! (मीढ्वः) मिह सेचने-क्वसु। हे सुखवर्षक (सुपुत्रा) शोभनपुत्रयुक्ता (सुभगा) सौभाग्यवती (असति) भवेत् ॥