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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विवाह संस्कार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सुबन्धुम्) सुन्दरबन्धु, (पतिवेदनम्) रक्षक पति के ज्ञान करानेहारे वा देनेहारे (अर्यमणम्)श्रेष्ठों के मान करनेहारे परमात्मा को (यजामहे) हम पूजते हैं। (उर्वारुकम् इव)ककड़ी को जैसे (बन्धनात्) लता बन्धन से, [वैसे दोनों वधू-वर को] (इतः) इस [वियोगपाश] से (प्र मुञ्चामि) मैं [विद्वान्] छुड़ाता हूँ, (अमुतः) उस [प्रेम पाश] से (न) नहीं [छुड़ाता] ॥१७॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा की महती कृपाका ध्यान करके विद्वान् लोग वधू-वर को वियोग के कष्ट से छुड़ाकर परस्परप्रेमास्पद बनावें ॥१७॥यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−७।५९।१२। औरयजुर्वेद में−३।६ ॥
टिप्पणी: १७−(अर्यमणम्) श्रेष्ठमानकर्तारम् (यजामहे) पूजयामः (सुबन्धुम्) (पतिवेदनम्) पत्युः प्रज्ञापकं प्रापकं वा (उर्वारुकम् इव)उरु+आरु+कम्। कृवापाजिमि०। उ० १।१। ऋ गतौ-उण्। कर्कटीफलम् (इव) यथा (बन्धनात्)लतावृन्तात् (प्र) (इतः) अस्मात्। वियोगपाशात् (मुञ्चामि) मोचयामि (न) निषेधे (अमुतः) तस्मात्। प्रेमपाशात् ॥
