0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विवाह संस्कार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (मनः) मन (अस्याः) इस [ब्रह्मचारिणी] का (अनः) रथ [समान] (आसीत्) होवे, (उत) और (द्यौः) सूर्य काप्रकाश (छदिः) छत्तर [समान] (आसीत्) होवे। (शुक्रौ) दोनों वीर्यवान् [वधूवर] (अनड्वाहौ) रथ चलानेवाले दो बैल [के समान] (आस्ताम्) होवें, (यत्) जब (सूर्या)प्रेरणा करनेवाली [वा सूर्य की चमक के समान तेजवाली] कन्या (पतिम्) पति को (अयात्) प्राप्त होवे ॥१०॥
भावार्थभाषाः - जब कन्या वेद आदिशास्त्र पढ़कर, मननशील, ताप आदि सहने योग्य हो और जब वैसा ही सुयोग्य पति हो, तबगृहाश्रम के चलाने में समर्थ होकर दोनों प्रीतिपूर्वक विवाह करें ॥१०॥
टिप्पणी: १०−(मनः)मननम्। अन्तःकरणम् (अस्याः) कन्यायाः (अनः) रथः (आसीत्) स्यात् (द्यौः)सूर्यप्रकाशः (आसीत्) (उत) अपि (छदिः) छत्रम्। आतपत्रम् (शुक्रौ) शुक्र-अर्शआद्यच्। वीर्यवन्तौ दम्पती (अनड्वाहौ) रथवाहकौ वृषभौ यथा (आस्ताम्) स्याताम्।अन्यद्-गतम्-म० ६ ॥
