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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तस्य) उस का [परमेश्वर का बनाया हुआ] (एषः) यह (मारुतः) मनुष्यों का (गणः) समूह है, [क्योंकि] (सः) वह [परमेश्वर] (शिक्याकृतः) छींके में किये हुए सा (एति) व्यापक है ॥८॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर मनुष्यों को उन के कर्मानुसार बनाता है। वह सब में ऐसा व्यापक है, जैसे कोई पदार्थ छींके के भीतर रक्खा हो ॥८॥
टिप्पणी: ८−(तस्य) परमेश्वरस्य रचितः (एषः) दृश्यमानः (मारुतः) मारुतं मरुतां मनुष्याणामिदम्-दयानन्दभाष्ये, ऋग्० २।११।१४। मनुष्यसम्बद्धः (गणः) समूहः (सः) (एति) व्याप्नोति (शिक्याकृतः) स्रंसेः शिः कुट् किच्च। उ० ५।१६। स्रंसु अधःपतने गतौ-यत्, कित् कुट् च, धातोः शि-इत्यादेशः, टाप्। शिक्यायां काचे कृतो धृतो यथा ॥
