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प॒श्चात्प्राञ्च॒ आ त॑न्वन्ति॒ यदु॒देति॒ वि भा॑सति ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पश्चात् । प्राञ्च: । आ । तन्वन्ति । यत् । उत्ऽएति । वि । भासति ॥४.७॥

अथर्ववेद » काण्ड:13» सूक्त:4» पर्यायः:0» मन्त्र:7


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - वे [सब लोक] [परमात्मा के] (पश्चात्) पीछे (प्राञ्चः) आगे बढ़ते हुए (आ) सब ओर से (तन्वन्ति) फैलते हैं, (यत्) जब वह (उदेति) उदय होता है और (वि भासति) विविध प्रकार चमकता है ॥७॥
भावार्थभाषाः - विवेकी योगी जन अनुभव करते हैं कि यह सब लोक परमात्मा के ही धारण-आकर्षण नियमों में चलते हैं ॥७॥
टिप्पणी: ७−(पश्चात्) परमात्मानमनुसृत्य (प्राञ्चः) आभिमुख्येन गच्छन्तः (आ) समन्तात् (तन्वन्ति) विस्तीर्यन्ते (यत्) यदा (उदेति) उद्गच्छति (वि) विविधम् (भासति) दीप्यते ॥