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तं व॒त्सा उप॑ तिष्ठ॒न्त्येक॒शीर्षा॑णो यु॒ता दश॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तम् । वत्सा: । उप । तिष्ठन्ति । एकऽशीर्षाण: । युता: । दश ॥४.६॥

अथर्ववेद » काण्ड:13» सूक्त:4» पर्यायः:0» मन्त्र:6


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (तम्) उस [परमात्मा] को (एकशीर्षाणः) एक [परमात्मा] को शिर [प्रधान] माननेवाले (दश) दस [चार दिशाओं, चार मध्य दिशाओं और ऊपर-नीचे की दिशाओं से सम्बन्धवाले] (युताः) मिले हुए (वत्साः) निवास स्थान [सब लोक] (उप तिष्ठन्ति) सेवते हैं ॥६॥
भावार्थभाषाः - जो परमात्मा सूर्य आदि सब लोकों को धारण-आकर्षण द्वारा अपनी आज्ञा में रखता है, उसकी भक्ति सब मनुष्य करें ॥६॥
टिप्पणी: ६−(तम्) परमात्मानम् (वत्साः) वस निवासे-स प्रत्ययः। निवासस्थानाः सर्वलोकाः (उपतिष्ठन्ति) सेवन्ते (एकशीर्षाणः) एकः परमेश्वरः शिरः प्रधानो येषां ते (युताः) संयुक्ताः (दश) ऊर्ध्वाधोभ्यां सह पूर्वादिचतसृभिः, ईशानादिचतसृभिर्दिग्भिः सम्बद्धाः ॥