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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे परमेश्वर !] तू (भवद्वसुः) धन प्राप्त करानेवाला, (इदद्वसुः) श्रेष्ठ पुरुषों को ऐश्वर्यवान् करनेवाला, (संयद्वसुः) पृथिवी आदि लोकों को नियम में रखनेवाला और (आयद्वसुः) निवास साधनों का फैलानेवाला है, (इति) इस प्रकार से (वयम्) हम (त्वा उप आस्महे) तेरी उपासना करते हैं ॥५४॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यो ! परमेश्वर की उपासना से परस्पर सुधार करो, उसने तुम्हारे लिये सुवर्ण आदि धन, श्रेष्ठ पुरुष पृथिवी आदि लोक और अनेक सुख के साधन उत्पन्न किये हैं ॥५४॥
टिप्पणी: ५४−(भवद्वसुः) भू सत्तायां प्राप्तौ च-शतृ। भवन्ति प्राप्नुवन्ति वसूनि धनानि यस्मात् सः (इदद्वसुः) इदि परमैश्वर्ये-शतृ, नकारलोपश्छान्दसः। इन्दन्ति परमैश्वर्यवन्तो भवन्ति वसवः श्रेष्ठा यस्मात् सः (संयद्वसुः) यम-नियमे-क्विप्। संयमयति वसून् पृथिव्यादिलोकान् यः सः (आयद्वसुः) आङ्+यमु उपरमे-क्विप्। आयच्छते विस्तारयति वसूनि निवाससाधनानि यः सः। अन्यत् पूर्ववत् ॥
