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प्रथो॒ वरो॒ व्यचो॑ लो॒क इति॒ त्वोपा॑स्महे व॒यम् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्रथ: । वर: । व्यच: । लोक: । इति । त्वा । उप । आस्महे । वयम् ॥९.२॥

अथर्ववेद » काण्ड:13» सूक्त:4» पर्यायः:0» मन्त्र:53


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे परमात्मन् !] तू (प्रथः) प्रसिद्ध, (वरः) श्रेष्ठ, (व्यचः) यथावत् मिला हुआ [ब्रह्म] और (लोकः) देखने योग्य [ईश्वर] है, (इति) इस प्रकार से (वयम्) हम (त्वा उप आस्महे) तेरी उपासना करते हैं ॥५३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य सुप्रसिद्ध आदि जगदीश्वर की उपासना से अपने को सुप्रसिद्ध, श्रेष्ठ, सर्वसम्बन्धी और दर्शनीय बनावें ॥५३॥
टिप्पणी: ५३−(प्रथः) प्रख्यातम् (वरः) वृञ् वरणे-असुन्। श्रेष्ठम् (व्यचः) अ० ४।१९।६। व्यच छले सम्बन्धे च-असुन्। सर्वसम्बद्धम् (लोकः) दर्शनीयः। अन्यत् पूर्ववत् ॥