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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे परमेश्वर !] तू (अम्भः) व्यापक, (अरुणम्) ज्ञानस्वरूप, (रजतम्) प्रीति का हेतु आनन्दस्वरूप, (रजः) ज्योतिःस्वरूप और (सहः) सहनशील [ब्रह्म] है, (इति) इस प्रकार से (वयम्) हम (त्वा उप आस्महे) तेरी उपासना करते हैं ॥५१॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् लोग सर्वव्यापक सर्वज्ञ आदि परमेश्वर की उपासना बार-बार आदरपूर्वक कर के पुरुषार्थ करें ॥५१॥
टिप्पणी: ५१−(अम्भः) म० ५०। व्यापकम् (अरुणम्) अर्त्तेश्च। उ० ३।६०। ऋ गतिप्रापणयोः-उनन्, चित्। ज्ञानस्वरूपम् (रजतम्) पृषिरञ्जिभ्यां कित्। उ० ३।१११। रञ्ज रागे-अतच्, कित्। रजति प्रियं भवतीति रजतम्। प्रीतिहेतु। आनन्दस्वरूपम् (रजः) रञ्ज रागे-असुन्। रजो रजतेः, ज्योती रज उच्यते-निरु० ४।१९। तेजःस्वरूपं ब्रह्म। अन्यद् गतम् ॥
