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स य॒ज्ञस्तस्य॑ य॒ज्ञः स य॒ज्ञस्य॒ शिर॑स्कृ॒तम् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स: । यज्ञ: । तस्य । यज्ञ: । स: । यज्ञस्य । शिर: । कृतम् ॥७.१२॥

अथर्ववेद » काण्ड:13» सूक्त:4» पर्यायः:0» मन्त्र:40


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह [परमात्मा] (यज्ञः) संयोग-वियोग करनेवाला है, (तस्य) उस [परमात्मा] का (यज्ञः) संयोग-वियोग व्यवहार है, (सः) वह [परमात्मा] (यज्ञस्य) संयोग-वियोग व्यवहार का (शिरः) शिर [प्रधान] (कृतम्) किया गया है ॥४०॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा संसार में परमाणुओं का संयोग-वियोग करने से सृष्टि और प्रलय का आदि कारण है, ऐसा विद्वान् मानते हैं ॥४०॥
टिप्पणी: ४०−(सः) परमेश्वरः (यज्ञः) म० ३९। संयोगवियोगकर्ता (तस्य) परमेश्वरस्य (यज्ञः) संयोगवियोगव्यवहारः (सः) परमेश्वरः (यज्ञस्य) संयोगवियोगव्यवहारस्य (शिरः) प्रधानः (कृतम्) ॥