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स रु॒द्रो व॑सु॒वनि॑र्वसु॒देये॑ नमोवा॒के व॑षट्का॒रोऽनु॒ संहि॑तः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स: । रुद्र: । वसुऽवनि: । वसुऽदेये । नम:ऽवाके । वषट्ऽकार: । अनु । सम्ऽहित: ॥६.५॥

अथर्ववेद » काण्ड:13» सूक्त:4» पर्यायः:0» मन्त्र:26


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह (रुद्रः) ज्ञानदाता, (वसुवनिः) श्रेष्ठों का उपकारी [परमेश्वर] (वसुदेये) श्रेष्ठों करके देने योग्य (नमोवाके) नमस्कार वचन में (वषट्कारः) दान करनेवाला (अनु) निरन्तर (संहितः) स्थापित है ॥२६॥
भावार्थभाषाः - वह परमात्मा वेद द्वारा ज्ञान देकर श्रेष्ठों का मान करता है और उपासकों को सदा सुख देता है ॥२६॥
टिप्पणी: २६−(सः) परमेश्वरः (रुद्रः) रु गतौ-क्विप् तुक् च+रा दाने-क। ज्ञानदाता (वसुवनिः) वसु+वन उपकारे-इन्। वसूनां श्रेष्ठानामुपकारकः (वसुदेये) वसुभिः श्रेष्ठैर्दातव्ये (नमोवाके) नमस्कारवचने (वषट्कारः) वह प्रापणे-डषटि। दानस्य कर्ता (अनु) निरन्तरम् (संहितः) स्थापितः ॥