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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह [परमेश्वर] (सर्वस्मै) सब [जगत्] के हित के लिये [उस सबको] (वि) विविध प्रकार (पश्यति) देखता है, (यत्) जो (प्राणति) श्वास लेता है, (च च) और (यत्) जो (न) नहीं [श्वास लेता है] ॥१९॥
भावार्थभाषाः - ऊपर मन्त्र ११ देखो, उसी के समान भावार्थ है ॥१९॥
टिप्पणी: १९−(सर्वस्मै) समस्ताय जगते। अन्यत् पूर्ववत्-म० ११ ॥
