वांछित मन्त्र चुनें

स सर्व॑स्मै॒ वि प॑श्यति॒ यच्च॑ प्रा॒णति॒ यच्च॒ न ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स: । सर्वस्मै । वि । पश्यति । यत् । च । प्राणति । यत् । च । न ॥५.६॥

अथर्ववेद » काण्ड:13» सूक्त:4» पर्यायः:0» मन्त्र:19


0 बार पढ़ा गया

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह [परमेश्वर] (सर्वस्मै) सब [जगत्] के हित के लिये [उस सबको] (वि) विविध प्रकार (पश्यति) देखता है, (यत्) जो (प्राणति) श्वास लेता है, (च च) और (यत्) जो (न) नहीं [श्वास लेता है] ॥१९॥
भावार्थभाषाः - ऊपर मन्त्र ११ देखो, उसी के समान भावार्थ है ॥१९॥
टिप्पणी: १९−(सर्वस्मै) समस्ताय जगते। अन्यत् पूर्ववत्-म० ११ ॥