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स प्र॒जाभ्यो॒ वि प॑श्यति॒ यच्च॑ प्रा॒णति॒ यच्च॒ न ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स: । प्रऽजाभ्य: । वि । पश्यति । यत् । च । प्राणति । यत् । च । न ॥४.११॥

अथर्ववेद » काण्ड:13» सूक्त:4» पर्यायः:0» मन्त्र:11


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह [परमेश्वर] (प्रजाभ्यः) उत्पन्न जीवों के हित के लिये [उस सबको] (वि) विविध प्रकार (पश्यति) देखता है, (यत्) जो (प्राणति) श्वास लेता है (च च) और (यत्) जो (न) नहीं [श्वास लेता है] ॥११॥
भावार्थभाषाः - जो परमात्मा जङ्गम और स्थावर जगत् की यथावत् सुधि लेकर सबका पालन करता है, उसकी उपासना सब मनुष्य करें ॥११॥इसका मिलान आगे मन्त्र १९ से करो ॥
टिप्पणी: ११−(सः) परमेश्वरः (प्रजाभ्यः) उत्पन्नजीवानां हिताय (वि) विविधम् (पश्यति) विलोकयति (यत्) सृष्टिजातम् (च) (प्राणति) प्रश्वसिति (यत्) (च) (न) निषेधे ॥