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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तस्य) उस [परमेश्वर] के (हिताः) धरे हुए [शरीर के] (इमे) यह (नव) नौ [दो कान, दो आँख, दो नथने, एक मुख, एक गुदा और एक उपस्थ] (कोशाः) आधार, (विष्टम्भाः) विशेष स्तम्भ [आलम्ब, सहारे] [अपनी, शक्तियों सहित] (नवधा) नव प्रकार से हैं ॥१०॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर ने नव द्वारवाले शरीर में श्रोत्रादि अद्भुत गोलक बनाकर उन में श्रवण आदि नव अद्भुत शक्तियाँ रक्खी हैं ॥१०॥
टिप्पणी: १०−(तस्य) परमेश्वरस्य (इमे) दृश्यमानाः (नव) देहे द्वे श्रोत्रे, चक्षुषी, नासिके च मुखं च द्वे पापूपस्थे च (कोशाः) आधाराः (विष्टम्भाः) विशेषस्तम्भाः। आलम्बाः (नवधा) श्रवणादिशक्तिभिः सह नव प्रकारेण (हिताः) धृताः ॥
