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कृ॒ष्णायाः॑ पु॒त्रो अर्जु॑नो॒ रात्र्या॑ व॒त्सोजा॑यत। स ह॒ द्यामधि॑ रोहति॒ रुहो॑ रुरोह॒ रोहि॑तः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

कृष्णाया: । पुत्र: । अर्जुन: । रात्र्या: । वत्स: । अजायत । स: । ह । द्याम् । अधि । रोहति । रुह: । रुरोह । रोहित: ॥३.२६॥

अथर्ववेद » काण्ड:13» सूक्त:3» पर्यायः:0» मन्त्र:26


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमात्मा और जीवात्मा का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (कृष्णायाः) कृष्ण वर्णवाली (रात्र्याः) रात्रि से [प्रलय की रात्रि के पीछे] (पुत्रः) शुद्ध करनेवाला, (अर्जुनः) रस प्राप्त करनेवाला (वत्सः) निवास देनेवाला सूर्य [जिस परमेश्वर के नियम से] (अजायत) प्रकट हुआ है। (सः ह) वही (रोहितः) सबका उत्पन्न करनेवाला [परमेश्वर] (द्याम् अधि) उस सूर्य में (रोहति) प्रकट होता है, उस ने (रुहः) सृष्टि की सामग्रियों को (रुरोह) उत्पन्न किया है ॥२६॥
भावार्थभाषाः - जिस सर्वव्यापक परमेश्वर के नियम से प्रलय के पीछे सूर्य आदि लोक उत्पन्न होते हैं, मनुष्य उसकी आराधना कर के सदा सुखी रहें ॥२६॥इस मन्त्र का चौथा पाद आ चुका है-अ० —१३।१।४ ॥ इति तृतीयोऽनुवाकः ॥
टिप्पणी: २६−(कृष्णायाः) कृष्णवर्णायाः (पुत्रः) पुवो ह्रस्वश्च। उ० ४।१६५। पूञ् शोधने−क्त्र। शोधकः (अर्जुनः) रसानां संग्रहीता (रात्र्याः) प्रलय-रात्रिपश्चादित्यर्थः (वत्सः) वस निवासे-स प्रत्ययः। निवासहेतुः सूर्यलोकः (अजायत) प्रकटोऽभवत् (सः) (ह) एव (द्याम् अधि) सूर्यं प्रति (रोहति) प्रादुर्भवति (रुहः) अ० १३।१।४। सृष्टिसामग्रीः (रुरोह) जनयामास (रोहितः) सर्वोत्पादकः परमेश्वरः ॥