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एक॑पा॒द्द्विप॑दो॒ भूयो॒ वि च॑क्रमे॒ द्विपा॒त्त्रिपा॑दम॒भ्येति प॒श्चात्। चतु॑ष्पाच्चक्रे॒ द्विप॑दामभिस्व॒रे सं॒पश्य॑न्प॒ङ्क्तिमु॑प॒तिष्ठ॑मानः। तस्य॑ दे॒वस्य॑ क्रु॒द्धस्यै॒तदागो॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॑ ब्राह्म॒णं जि॒नाति॑। उद्वे॑पय रोहित॒ प्र क्षि॑णीहि ब्रह्म॒ज्यस्य॒ प्रति॑ मुञ्च॒ पाशा॑न् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

एकऽपात् । द्विऽपद: । भूय: । वि । चक्रमे । द्विऽपात् । त्रिऽपादम् । अभि । एति । पश्चात् । चतु:ऽपात् । चक्रे । द्विऽपदाम् । अभिऽस्वरे । सम्ऽपश्यन् । पङ्क्तिम् । उपऽत‍िष्ठमान: । तस्य । देवस्य ॥ क्रुध्दस्य । एतत् । आग: । य: । एवम् । विद्वांसम् । ब्राह्मणम् । जिनाति । उत् । वेपय । रोहित । प्र । क्षिणीहि । ब्रह्मऽज्यस्य । प्रति । मुञ्च । पाशान् ॥३.२५॥

अथर्ववेद » काण्ड:13» सूक्त:3» पर्यायः:0» मन्त्र:25


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमात्मा और जीवात्मा का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (एकपात्) एकरस व्यापक परमेश्वर (द्विपदः) दो प्रकार की स्थितिवाले [जङ्गम स्थावर जगत्] से (भूयः) अधिक आगे (वि) फैल कर (चक्रमे) चला गया, (द्विपात्) दो [भूत भविष्यत्] में गतिवाला परमात्मा (पश्चात्) फिर (त्रिपादम्) तीन लोक में [सूर्य, भूमि अर्थात् प्रकाशमान और अप्रकाशमान और मध्य लोक में] (अभि) सब ओर से (एति) प्राप्त होता है। (चतुष्याद्) चारों [पूर्व आदि चारों दिशाओं] में व्यापक परमेश्वर ने (द्विपदाम्) दो प्रकार की स्थितिवाले [जङ्गम और स्थावरों] के (अभिस्वरे) सब ओर से पुकारने पर (उपतिष्ठमानः) समीप ठहरते हुए और (पङ्क्तिम्) पाँति [सृष्टि की श्रेणी] को (संपश्यन्) निहारते हुए (चक्रे) [कर्तव्य को] किया है। (तस्य) उस (क्रुद्धस्य) क्रुद्ध (देवस्य) प्रकाशमान [ईश्वर] के लिये (एतत्) यह (आगः) अपराध है, [कि] (यः) जो मनुष्य (एवम्) ऐसे (विद्वांसम्) विद्वान् (ब्राह्मणम्) ब्राह्मण [वेदज्ञाता] को (जिनाति) सताता है। (रोहित) हे सर्वोत्पादक परमेश्वर [उस शत्रु को] (उद् वेपय) कंपा दे, (प्र क्षिणीहि) नाश कर दे, (ब्रह्मज्यस्य) ब्रह्मचारी के सतानेवाले के (पाशान्) फन्दों को (प्रति मुञ्च) बाँध दे ॥२५॥
भावार्थभाषाः - जो सर्वव्यापक परमात्मा सदा वर्तमान रहकर सब संसार का पालन करता है, सब मनुष्य उसकी उपासनापूर्वक विघ्नों से बचकर आनन्द पावें ॥२५॥इस मन्त्र के प्रथम दो पाद आचुके हैं-अ० १३।२।२७ और आवृत्ति छोड़ कर शेष मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१०।११७।८ ॥
टिप्पणी: २५−(एकपात्)... (पश्चात्) इति व्याख्यातः-अ० १३।२।२७। (चतुष्पात्) चतसृषु दिक्षु व्यापकः परमेश्वरः (चक्रे) कर्तव्यं कृतवान् (द्विपदाम्) जङ्गमस्थावररूपेण स्थितिवताम् (अभिस्वरे) सर्वतः शब्दकरणे (सम्पश्यन्) अवलोकयन् (पङ्क्तिम्) विस्तारम् (उपतिष्ठमानः) समीपे वर्तमानः। अन्यत् पूर्ववत्-म० १ ॥