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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (रोहितः) सर्वजनक [परमेश्वर] (लोकः) लोकोंवाला [सब लोकों का स्वामी] (अभवत्) हुआ, (रोहितः) सर्वोत्पादक [ईश्वर] ने (दिवम्) सूर्य को (अति) अत्यन्त करके (अतपत्) तापवाला किया। (रोहितः) सर्वस्रष्टा [ईश्वर] ने (रश्मिभिः) [सूर्य की] किरणों से (भूमिम्) भूमि और (समुद्रम्) अन्तरिक्ष [आकाशस्थ चन्द्र तारागण आदि लोकसमूह] को (अनु) अनुकूलता से (सं चरत्) संचारवाला किया ॥४०॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर ने सब लोकों का स्वामी होकर सूर्य द्वारा उन में ताप पहुँचाकर उनमें घूमने और चलने की शक्ति दी है ॥४०॥
टिप्पणी: ४०−(रोहितः) सर्वोत्पादकः (लोकः) लोक-अर्शआद्यच्। लोकवान्। सर्वलोकस्वामी (अभवत्) (रोहितः) (अति) अत्यन्तम् (अतपत्) तापवन्तं कृतवान् (दिवम्) सूर्यम् (रोहितः) (रश्मिभिः) सूर्यकिरणैः (भूमिम्) (समुद्रम्) अन्तरिक्षम्-निघ० १।३। (अनु) आनुकूल्येन (सम्) सम्यक् (चरत्) अडभावः, अन्तर्गतण्यर्थः। अचरत्। अचारयत्। चालितवान् ॥
