परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यम्) जिस (विपश्चितम्) विविध प्रकार [पार्थिव रस] एकत्र करनेवाले (भ्राजमानम्) प्रकाशमान, (तरणिम्) [अन्धकार से] पार करनेवाले सूर्य को (सप्त) सात [शुक्ल, नील, पीत, रक्त, हरित, कपिश, चित्र वर्णवाली] (बह्वीः) बहुत [भिन्न-भिन्न प्रकारवाली] (हरितः) आकर्षक किरणें (वहन्ति) ले चलती हैं। (यम्) जिस [सूर्य] को (अत्रिः) नित्यज्ञानी [परमात्मा] ने (स्रुतात्) बहते हुए [प्रकृतिरूप समुद्र] से (दिवम्) आकाश में (उन्निनाय) ऊँचा किया है, (तम् त्वा) उसे तुझ [सूर्य] को (आजिम्) मर्यादा पर (परियान्तम्) सर्वथा चलता हुआ (पश्यन्ति) वे [विद्वान्] देखते हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः - जिस परमात्मा ने प्रलय के पीछे अनेक लोकों के धारक आकर्षक सूर्य को रचकर दृढ़ता से आकाश में चलाया है, विद्वान् लोग परमेश्वर की उस बड़ी महिमा को विचार कर वैदिक मार्ग पर दृढ़ होकर चलते हैं ॥४॥इस मन्त्र से मन्त्र २४ तक सूर्य का वर्णन करके परमेश्वर की महिमा का वर्णन किया है। मन्त्र २४ की टिप्पणी देखो ॥