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चि॒त्रश्चि॑कि॒त्वान्म॑हि॒षः सु॑प॒र्ण आ॑रो॒चय॒न्रोद॑सी अ॒न्तरि॑क्षम्। अ॑होरा॒त्रे परि॒ सूर्यं॒ वसा॑ने॒ प्रास्य॒ विश्वा॑ तिरतो वी॒र्याणि ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

चित्र: । चिकित्वान् । महिष: । सुऽपर्ण: । आऽरोचयन् । रोदसी इति । अन्तरिक्षम् । अहोरात्रे इति । परि । सूर्यम् । वसाने इति । प्र । अस्य । विश्वा । तिरत: । वीर्याणि ॥२.३२॥

अथर्ववेद » काण्ड:13» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:32


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (चित्रः) अद्भुत, (चिकित्वान्) समझवाला, (महिषः) महान् (सुपर्णः) बड़ा पालन करनेवाला [परमेश्वर] (रोदसी) दोनों सूर्य और पृथिवी [प्रकाशमान अप्रकाशमान लोकों] और (अन्तरिक्षम्) [उनके] मध्य लोक को (आरोचयन्) चमका देता हुआ [वर्तमान है]। (सूर्यम्) सूर्य लोक को (परि) सब ओर से (वसाने) ओढ़े हुए (अहोरात्रे) दोनों दिन और रात्रि (अस्य) इस [परमात्मा] के (विश्वा) व्यापक (वीर्याणि) वीर कर्मों को (प्र तिरतः) बढ़ाते हैं [प्रसिद्ध करते हैं] ॥३२॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर बड़ा आश्चर्यस्वरूप सब सृष्टि का कर्ता है। उसी के नियम अनुसार सूर्य और पृथिवी के घुमाव से दिन-रात्रि उत्पन्न होकर हमें पुरुषार्थ के योग्य बनाते हैं, हे विद्वानों ! उसी परमेश्वर को पहिचान कर अपने को बढ़ाओ ॥३२॥
टिप्पणी: ३२−(चित्रः) अद्भुतः (चिकित्वान्) कित ज्ञाने कि ज्ञाने वा-क्वसु। ज्ञानवान् (महिषः) महान् (सुपर्णः) बहुपालनोपेतः (आरोचयन्) प्रदीपयन् (रोदसी) द्यावापृथिव्यौ (अन्तरिक्षम्) (अहोरात्रे) (परि) सर्वतः (सूर्यम्) लोकप्रेरकं रविमण्डलम् (वसाने) आच्छादयन्ती (प्र तिरतः) वर्धयतः। प्रसिद्धानि कुरुतः (अस्य) परमेश्वरस्य (विश्वानि) व्यापकानि (वीर्याणि) वीरकर्माणि ॥