परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) जिस कारण से कि तू (प्राङ्) सन्मुख [वा पूर्व में] जाता हुआ और (प्रत्यङ्) पीछे [वा पश्चिम में] जाता हुआ (स्वधया) अपनी धारण शक्ति से (शीभम्) शीघ्र (यासि) चलता है, और (मायया) अपनी बुद्धिमत्ता से (नानारूपे) विरुद्ध रूपवाले (अहनी) दोनों दिन राति को (कर्षि) तू बनाता है। (तत्) उसी कारण से, (आदित्य) हे प्रकाशस्वरूप परमेश्वर ! (तत्) वह (ते) तेरी (महि महि) बड़ी-बड़ी (श्रवः) कीर्ति है, (यत्) कि (एकः) एक ही तू (विश्वम्) सब (भूम परि) बहुतायत [संसार] में सब ओर से (जायसे) प्रकट होता है ॥३॥
भावार्थभाषाः - अद्वितीय परमात्मा सृष्टि के आदि अन्त और स्थिति में वर्तमान रहकर विरुद्ध स्वभाववाले प्रकाश और अन्धकारयुक्त दिन-राति को बनाता है, वैसे ही वह जड़ और चैतन्य जगत् को रचकर सबका पोषण करता है, उसी प्रकार मनुष्य विघ्नों को हटा कर आत्मबल बढ़ा कर पुरुषार्थ करें ॥३॥