परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो [परमेश्वर] (विश्वचर्षणिः) सबका देखनेवाला, (उत) और (विश्वतोमुखः) सब ओर से मुख [मुख्य व्यवहार वा उपाय] वाला, (यः) जो (विश्वतस्पाणिः) सब ओर से हाथ के व्यवहारवाला, (उत) और (विश्वतस्पृथः) सब ओर से पूर्तिवाला है। (एकः) वह अकेला (देवः) प्रकाशस्वरूप [परमात्मा] (बाहुभ्याम्) दोनों [धारण-आकर्षण रूप] भुजाओं से (पतत्रैः सम्) गमनशील परमाणुओं के साथ (द्यावापृथिवी) सूर्य पृथिवी को (जनयन्) उत्पन्न करता हुआ (सम्) यथावत् (भरति) पुष्ट करता है ॥२६॥
भावार्थभाषाः - निराकार सर्वशक्तिमान् अकेले जगदीश्वर ने सब आगा-पीछा देख, सब प्रकार के संयोग-वियोग आदि उपायों से परमाणुओं में धारण आकर्षण-सामर्थ्य देकर कुम्भकार के समान सब जगत् को रचा है, उसकी उपासना सब मनुष्य करें ॥२६॥यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है १०।८१।३, और यजुर्वेद १७।१९ ॥