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अयु॑क्त स॒प्त शु॒न्ध्युवः॒ सूरो॒ रथ॑स्य न॒प्त्यः। ताभि॑र्याति॒ स्वयु॑क्तिभिः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अयुक्त । सप्त । शुन्ध्युव: । सूर: । रथस्य । नप्त्य: । ताभि: । याति । स्वयुक्तिऽभि: ॥२.२४॥

अथर्ववेद » काण्ड:13» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:24


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (सूरः) सूर्य [लोकप्रेरक रविमण्डल] ने (रथस्य) रथ [अपने चलने के विधान] की (नप्त्यः) न गिरानेवाली (सप्त) सात [शुक्ल, नील, पीत आदि म० ४] (शुन्ध्युवः) शुद्ध करनेवाली किरणों को (अयुक्त) जोड़ा है। (ताभिः) उन (स्वयुक्तिभिः) धन से संयोगवाली [किरणों के साथ] (याति) वह चलता है ॥२४॥
भावार्थभाषाः - जो सूर्य अपनी परिधि के लोकों को अपने आकर्षण में रखकर चलाता है और जिसकी किरणें रोगों को हटाकर प्रकाश और वृष्टि आदि से संसार को धनी बनाती हैं, उस सूर्य को जगदीश्वर परमात्मा ने बनाया है ॥२४॥मन्त्र ४ से इस मन्त्र तक सूर्य के गुणों का वर्णन करके परमेश्वर की महिमा का वर्णन किया है। अब फिर वही प्रकरण परमेश्वरविषयक चलता है ॥यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१।५०।९, और सामवेद−पू० ६।१४।१३ ॥
टिप्पणी: २४−(अयुक्त) योजितवान् (सप्त) सप्तसंख्याकाः-म० ४ (शुन्ध्युवः) यजिमनिशुन्धि०। उ–० ३।२०। शुन्ध विशुद्धौ-युच्। शोधिका (सूरः) षू प्रेरणे−क्रन्। लोकप्रेरकः सूर्यः (रथस्य) गमनविधानस्य (नप्त्यः) इक् कृष्यादिभ्यः। वा० पा० ३।३।१०८। नञ्+पत्लृ पतने-इक्। तनिपत्योश्छन्दसि। पा० ६।४।९९। इत्युपधालोपः, शसो जस्। नप्तीः। अपातनशीलाः। न पातयित्रीः (ताभिः) (याति) गच्छति (स्वयुक्तिभिः) स्वस्य धनस्य योजनशक्तिभिः ॥