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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (देव) हे चलनेवाले (सूर्य) सूर्य ! [रविमण्डल] (सप्त) सात [शुक्ल, नील, पीत आदि-म० ४] (हरितः) आकर्षक किरणें (शोचिष्केशम्) पवित्र प्रकाशवाले (विचक्षणम्) विविध प्रकार दिखानेवाले (त्वाम्) तुझको (रथे) रथ [गमन विधान] में (वहन्ति) ले चलती हैं ॥२३॥
भावार्थभाषाः - यह प्रकाशमान सूर्यलोक शुक्ल, नील, पीत आदि सात किरणों द्वारा अपनी धुरी पर अपने घेरे में घूमता है। इस नियम का बनानेवाला वह परमेश्वर है ॥२३॥यह मन्त्र ऋग्वेद में है−१।५०।८, और साम० पू० ६।१४।१४ ॥
टिप्पणी: २३−(सप्त) नीलपीतादिसप्तवर्णाः-म० ४ (त्वा) (हरितः) आकर्षकाः किरणाः (रथे) म० ६। गमनविधाने (वहन्ति) गमयन्ति (देव) हे गमनशील (सूर्य) रविमण्डल (शोचिष्केशम्) शोचिषः शुचयः केशाः प्रकाशा यस्य तम् (विचक्षणम्) विविधं दर्शकम् ॥
