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अप॒ त्ये ता॒यवो॑ यथा॒ नक्ष॑त्रा यन्त्य॒क्तुभिः॑। सूरा॑य वि॒श्वच॑क्षसे ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अप । त्ये । तायव: । यथा । नक्षत्रा । यन्ति । अक्तुऽभि: । सूराय । विश्वऽचक्षसे ॥२.१७॥

अथर्ववेद » काण्ड:13» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:17


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (विश्वचक्षसे) सबके दिखानेवाले (सूराय) सूर्य के लिये (अक्तुभिः) रात्रियों के साथ (नक्षत्रा) चलनेवाले तारागण (अप यन्ति) भाग जाते हैं, (यथा) जैसे (त्ये) वे (तायवः) चोर [भाग जाते हैं] ॥१७॥
भावार्थभाषाः - सूर्य के प्रकाश से रात्रि का अन्धकार मिट जाता है, मन्द चमकनेवाले नक्षत्र छिप जाते हैं और चोर लोग भाग जाते हैं, वैसे ही वेदविज्ञान फैलने से अधर्म का नाश और धर्म की वृद्धि होती है ॥१७॥यह मन्त्र ऋग्वेद में है−१।५०।२, और सामवेद में पू० ६।१४।७ ॥
टिप्पणी: १७−(अप) दूरीभावे (त्ये) ते (तायवः) तायृ सन्तानपालनयोः यद्वा तसु उपक्षये-उण् सस्य यः। चोराः। स्तेनाः-निघ० ३।२४। (यथा) (नक्षत्रा) अमिनक्षियजि०। उ० ३।१०५। णक्ष गतौ-अत्रन्। नक्षत्राणि नक्षतेर्गतिकर्मणः-निरु० ३।२०। गतिशीलास्तारकाः (यन्ति) गच्छन्ति (अक्तुभिः) पः किच्च। उ० १।७१। अञ्जू व्यक्तिम्रक्षणकान्तिगतिषु-तुन्, कित्, नलोपः। रात्रिभिः सह-निरु० १२।२–३। (सूराय) सूर्याय (विश्वचक्षसे) विश्वस्य चक्षो दर्शनं यस्मात् तस्मै। सर्वदर्शकाय ॥