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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (केतवः) किरणें (त्यम्) उस (जातवेदसम्) उत्पन्न पदार्थों को प्राप्त करनेवाले, (देवम्) चलते हुए (सूर्यम्) रविमण्डल को (विश्वाय दृशे) सबके देखने के लिये (उ) अवश्य (उत् वहन्ति) ऊपर ले चलती हैं ॥१६॥
भावार्थभाषाः - जिस प्रकार सूर्य किरणों के आकर्षण से ऊँचा होकर सब पदार्थों को प्रकट करता है, वैसे ही मनुष्य विद्या और धर्म से उन्नति करके सबका उपकार करें ॥१६॥यह मन्त्र ऋग्वेद में है−१।५०।१, यजु० ७।४१, ३३।३१ तथा सामवेद पू० १।३।५। तथा निरु० १२।१५। में व्याख्यात है ॥
टिप्पणी: १६−(उत्) ऊर्ध्वम् (उ) निश्चये (त्यम्) तम् (जातवेदसम्) यो जातान् पदार्थान् विन्दति तम् (देवम्) गच्छन्तम् (वहन्ति) गमयन्ति (केतवः) किरणाः (दृशे) द्रष्टुम् (विश्वाय) सर्वस्मै जगते (सूर्यम्) रविमण्डलम् ॥
