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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तम्) उस [मार्ग] को (जूतिभिः) अपने वेगों से (सम् आप्नोति) वह [सूर्य] समाप्त करता रहता है, (ततः) उस मार्ग से (न अपचिकित्सति) वह भूल नहीं करता। (तेन) उसी कारण से (देवानाम्) विजय चाहनेवालों के (अमृतस्य) अमरपन [जीवनसाधन] के (भक्षम्) सेवन को (न अव रुन्धते) वे [विघ्न] नहीं रोकते हैं ॥१५॥
भावार्थभाषाः - सूर्य निरन्तर घूम कर संसार में प्रकाश करता रहता है, उसी से सब पुरुषार्थी जन जीवनसामग्री पाते हैं ॥१५॥
टिप्पणी: १५−(तम्) अध्वानम् (समाप्नोति) सम्यक् प्राप्नोति (जूतिभिः) जवनैः। वेगैः (ततः) तस्मात् मार्गात् (न) निषेधे (अप) (चिकित्सति) कित व्याधिप्रतीकारनिग्रहापनयननाशनसंशयेषु−स्वार्थे सन्। संदेहं प्रमादं करोति (तेन) कारणेन (अमृतस्य) अमरणस्य। जीवनसाधनस्य। (भक्षम्) वृतॄवदिवचि०। उ० ३।६२। भज सेवायाम्-स। सेवनम् (देवानाम्) विजिगीषूणाम् (न) निषेधे (अव) (रुन्धते) वर्जयन्ति विघ्नाः ॥
