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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) जो कुछ (समुद्रम् अनु) समुद्र [संसार] में (श्रितम्) ठहरा हुआ है, (तत्) उस को (सूर्यः) सूर्य [लोकों का चलानेवाला रवि] (सिषासति) सेवा करना चाहता है। (अस्य) उस [सूर्य] का (अध्वा) मार्ग (विततः) फैला हुआ और (महान्) बड़ा है, (यः) जो [मार्ग] (पूर्वः) आगे (च च) और (अपरः) पीछे [अथवा पूर्व और पश्चिम] है ॥१४॥
भावार्थभाषाः - यह सूर्य अपने घेरे के भीतर सब लोकों को आकर्षण, वृष्टि आदि से सेवता है, उस नियम को निरखकर विद्वान् लोग मर्यादा पर चलें ॥१४॥
टिप्पणी: १४−(यत्) वस्तुजातम् (समुद्रम्) संसाररूपम् (अनु) प्रति (श्रितम्) स्थितम् (तत्) (सिषासति) षण संभक्तौ-सन्। सेवितुमिच्छति (सूर्यः) आदित्यलोकः (अध्वा) मार्गः (अस्य) सूर्यस्य (विततः) विस्तृतः (पूर्वः) (च) (अपरः) पश्चाद् भवः। पश्चिमः (च) (यः) मार्गः ॥
