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उ॒भावन्तौ॒ सम॑र्षसि व॒त्सः सं॑मा॒तरा॑विव। न॒न्वे॒तदि॒तः पु॒रा ब्रह्म॑ दे॒वा अ॒मी वि॑दुः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उभौ । अन्तौ । सम् । अर्षसि । वत्स: । संमातरौऽइव। ननु । एतत्। इत:। पुरा । ब्रह्म । देवा: । अमी इति । विदु: ॥2.१३॥

अथर्ववेद » काण्ड:13» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:13


पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे सूर्य !] तू (उभौ) दोनों (अन्तौ) अन्तों [पूर्व-पश्चिम अथवा आगे-पीछे दोनों ओर] को (सम्) ठीक-ठीक, (अर्षसि) पहुँचता है, (इव) जैसे (वत्सः) बालक (संमातरौ) दो सामान्य [मिली हुई] माताओं को। (ननु) निश्चय करके (एतत्) इस (ब्रह्म) ईश्वरज्ञान को (इतः पुरा) इस [समय] के पहिले से (अमी) यह (देवाः) विद्वान् लोग (विदुः) जानते हैं ॥१३॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर ने सूर्य को ऐसी उचित रीति से बनाया है कि वह निरन्तर घूमकर सृष्टि का उपकार करे, पूर्वज विद्वान् लोग ईश्वर के ऐसे नियमों को जानकर सुधार करते रहे हैं ॥१३॥
टिप्पणी: १३−(उभौ) द्वौ (अन्तौ) पूर्वापरौ पूर्वपश्चिमदेशौ वा (सम्) सम्यक् (अर्षसि) प्राप्नोषि (वत्सः) बालकः (संमातरौ) समानजनन्यौ (इव) यथा (ननु) निश्चयेन (एतत्) प्रत्यक्षम् (इतः) अस्मात् कालात् (पुरा) पूर्वम् (ब्रह्म) ईश्वरज्ञानम् (देवाः) विद्वांसः (अमी) वर्त्तमानाः (विदुः) जानन्ति ॥