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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
जीवात्मा और परमात्मा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे बड़े ऐश्वर्यवाले जगदीश्वर ! (पथः) वैदिक मार्ग से (वयम्) हम (मा प्र गाम) कभी दूर न जावें, और (मा) न (सोमिनः) ऐश्वर्ययुक्त (यज्ञात्) यज्ञ [देवपूजा, संगतिकरण और दान व्यवहार] से [दूर जावें]। (अरातयः) अदानी लोग (नः अन्तः) हमारे बीच (मा स्थुः) न ठहरें ॥५९॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् लोग परमात्मा की उपासना करते हुए सदा वैदिक मार्ग पर चल कर श्रेष्ठ कर्म करें और सुपात्रों को योग्य दान देते रहें ॥५९॥यह मन्त्र ऋग्वेद में है-म० १०।५७।१ ॥
टिप्पणी: ५९−(मा प्र गाम) नैव दूरे गच्छेम (पथः) वैदिकमार्गात् (वयम्) धार्मिकाः (मा) निषेधे (यज्ञात्) देवपूजासंगतिकरणदानव्यवहारात् (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन्, जगदीश्वर (सोमिनः) ऐश्वर्ययुक्तात् (अन्तः) मध्ये (मा स्थुः) न तिष्ठेयुः (नः) अस्माकम् (अरातयः) अदानशीलाः ॥
