यो मा॑भिच्छा॒यम॒त्येषि॒ मां चा॒ग्निं चा॑न्त॒रा। तस्य॑ वृश्चामि ते॒ मूलं॒ न च्छा॒यां क॑र॒वोऽप॑रम् ॥
पद पाठ
य: । मा । अभिऽछायम् । अतिऽएषि: । माम् । च । अग्निम् । च । अन्तरा । तस्य । वृश्चामि । ते । मूलम् । न । छायाम् । करव: । अपरम् ॥१.५७॥
अथर्ववेद » काण्ड:13» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:57
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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
जीवात्मा और परमात्मा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो तू (माम्) मेरे (च च) और (अग्निम् अन्तरा) अग्नि [अग्निसमान ज्ञानप्रकाश] के बीच [होकर] (अभिच्छायम् मा) मुझ तेज पाये हुए को (अत्येषि) उलाँघता है। (तस्य ते) उस तेरी (मूलम्) जड़ को (वृश्चामि) मैं काटता हूँ, तू (छायाम्) छाया [अन्धकार वा अविद्या] को (अपरम्) फिर (न) न (करवः) फैलावे ॥५७॥
भावार्थभाषाः - जैसे जलते हुए अग्नि का प्रकाश किसी वस्तु पर पड़ता है और कोई दोनों के बीच में पड़ कर प्रकाश को रोक दे, ऐसे ही जो दुराचारी वेदविद्या और ब्रह्मचारी के बीच विघ्न डालकर उत्तम व्यवहार के प्रचारों को रोके, उसे लोग दण्ड देकर नाश करें ॥५७॥
टिप्पणी: ५७−(यः) दुराचारी (मा) मां ब्रह्मचारिणम् (अभिच्छायम्) छाया कान्तिः म० ५६। अभिगता छाया कान्तिस्तेजो येन तं विद्वांसम् (अत्येषि) उल्लङ्घयसि (माम्) (च) (अग्निम्) अग्निवद् ज्ञानप्रकाशम्, (च) (अन्तरा) मध्ये। अन्यत् पूर्ववत्-म० ५६ ॥
