ब्रह्म॑णा॒ग्नी वा॑वृधा॒नौ ब्रह्म॑वृद्धौ॒ ब्रह्मा॑हुतौ। ब्रह्मे॑द्धाव॒ग्नी ई॑जाते॒ रोहि॑तस्य स्व॒र्विदः॑ ॥
पद पाठ
ब्रह्मणा । अग्नी इति । ववृधानौ । ब्रह्मऽवृध्दौ । ब्रह्मऽआहुतौ । ब्रह्मऽइध्दौ । अग्नी इति । ईजाते इति । रोहितस्य । स्व:ऽविद: ॥१.४९॥
अथर्ववेद » काण्ड:13» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:49
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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
जीवात्मा और परमात्मा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अग्नी) दोनों अग्नि [सूर्य और चन्द्रमा] (ब्रह्मणा) वेदज्ञान द्वारा (वावृधानौ) बढ़ते हुए, (ब्रह्मवृद्धौ) अन्न से बढ़े हुए, (ब्रह्माहुतौ) जल की आहुति [ग्रहण और दान] वाले हैं। (ब्रह्मेद्धौ) धन के साथ प्रकाश किये गये (अग्नी) उन दोनों अग्नियों ने (स्वर्विदः) सुख पहुँचानेवाले (रोहितस्य) सबके उत्पन्न करनेवाले परमेश्वर के लिये (ईजाते) यज्ञ [संयोग-वियोग व्यवहार] को किया है ॥४९॥
भावार्थभाषाः - ईश्वर की शक्ति से यह सूर्य और चन्द्रमा प्राणियों के लिये अन्न, वृष्टि और धन के कारण होते हैं ॥४९॥
टिप्पणी: ४९−(ब्रह्मणा) वेदज्ञानेन (अग्नी) सूर्याचन्द्रमसौ (वावृधानौ) वर्धमानौ (ब्रह्मवृद्धौ) ब्रह्माऽन्ननाम-निघ० २।७। अन्नेन प्रवृद्धौ (ब्रह्माहुतौ) ब्रह्मोदकनाम-निघ० १।१२। जलस्याहुतग्रहणदानव्यवहारो ययोस्तौ (ब्रह्मेद्धौ) ब्रह्म धननाम-निघ० २।१०। धनेन प्रकाशितौ। अन्यत् पूर्ववत्-म० ४७ ॥
