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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
जीवात्मा और परमात्मा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (हिमम्) शीत (च) और (घ्रंसम्) ताप को (आधाय) स्थापित करके, (पर्वतान्) पर्वतों को (यूपान्) जयस्तम्भ रूप (कृत्वा) बनाकर, (वर्षाज्यौ) वृष्टि को घी रूप रखनेवाले (अग्नी) दोनों अग्नियों [सूर्य और चन्द्रमा] ने (स्वर्विदः) सुख पहुँचानेवाले (रोहितस्य) सबके उत्पन्न करनेवाले परमेश्वर के लिये (ईजाते) यज्ञ [संयोग-वियोग व्यवहार] को किया है ॥४७॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर के सामर्थ्य से सूर्य चन्द्र आदि लोक नियमित होकर ताप, शीत, वृष्टि, पर्वत आदि की उत्पत्ति और स्थिति के कारण होते हैं ॥४७॥
टिप्पणी: ४७−(हिमम्) शीतम् (घ्रंसम्) म० ४६। तापम् (च) (आधाय) स्थापयित्वा (यूपान्) जयस्तम्भान् यथा (कृत्वा) विधाय (पर्वतान्) शैलान् (वर्षाज्यौ) वर्षं वृष्टिर्घृतवद्ययोस्तौ (अग्नी) सूर्याचन्द्रमसौ (ईजाते) यज देवपूजासंगतिकरणदानेषु-लिट्। यज्ञं संयोगवियोगव्यवहारं कृतवन्तौ (रोहितस्य) चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि। पा० २।३।६२। इति षष्ठी। रोहिताय। सर्वोत्पादकाय परमेश्वराय (स्वर्विदः) विद्लृ लाभे-क्विप्। सुखप्रापकाय ॥
