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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
जीवात्मा और परमात्मा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [संसार में] (उर्वीः) चौड़ी [दिशाएँ] (परिधयः) परकोटा रूप (आसन्) हुईं, (भूमिः) भूमि (वेदिः) वेदि [यज्ञकुण्ड] रूप (अकल्पत) बनायी गयी। (तत्र) उस में (रोहितः) सबके उत्पन्न करनेवाले परमेश्वर ने (एतौ) इन (अग्नी) दो अग्नियों [सूर्य और चन्द्रमा] को (घ्रंसम्) ताप (च) और (हिमम्) शीतरूप (आ अधत्त) स्थापित किया ॥४६॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को योग्य है कि परमेश्वर के बनाये दिशाओं, भूमि, सूर्य, चन्द्र, ताप, शीत आदि से विज्ञानपूर्वक उपकार लेवें ॥४६॥
टिप्पणी: ४६−(उर्वीः) उर्व्यः। विस्तृता दिशाः (आसन्) (परिधयः) प्राकाररूपाः (वेदिः) यज्ञकुण्डरूपा (भूमिः) (अकल्पत) रचिताऽऽसीत् (तत्र) (एतौ) प्रसिद्धौ (अग्नी) सूर्याचन्द्रमसौ (आ अधत्त) स्थापितवान् (हिमम्) शीतम् (घ्रंसम्) दिवः कित्। उ० ३।१२१। घृ दीप्तौ-असच्, कित्, पृषोदरादित्वाद्, नकारः। घ्रंसोऽहर्नाम-निघ० १।९। तापम् (च) (रोहितः) सर्वोत्पादकः परमेश्वरः ॥
