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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
जीवात्मा और परमात्मा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अमर्त्य) हे अमर ! [अविनाशी परमेश्वर] (ते) तेरे (तत्) उस को (वेद) मैं जानता हूँ, (यत्) जो (ते) तेरा (आक्रमणम्) चढ़ाव [व्याप्ति] (दिवि) प्रत्येक व्यवहार में है और (यत्) जो (ते) तेरा (सधस्थम्) सह स्थान (परमे) सबसे बड़े (व्योमन्) विविध रक्षासाधन [मोक्ष पद] में है ॥४४॥
भावार्थभाषाः - योगी को योग्य है कि उस नित्य शुद्ध परमात्मा को प्रत्येक पदार्थ में साक्षात् करके मोक्षसुख प्राप्त करे ॥४४॥
टिप्पणी: ४४−(वेद) जानामि (तत्) प्रसिद्धम् (ते) तव (अमर्त्य) हे अमर। अविनाशिन् (यत्) (ते) (आक्रमणम्) उपरिगमनम् (दिवि) प्रत्येकव्यवहारे (यत्) (ते) (सधस्थम्) सहस्थानम् (परमे) सर्वोत्कृष्टे (व्योमन्) विविधरक्षासाधने मोक्षपदे ॥
