आ॒रोह॒न्द्याम॒मृतः॒ प्राव॑ मे॒ वचः॑। उत्त्वा॑ य॒ज्ञा ब्रह्म॑पूता वहन्त्यध्व॒गतो॒ हर॑यस्त्वा वहन्ति ॥
पद पाठ
आऽरोहन् । द्याम् । अमृत: । प्र । अव । मे । वच: । उत् । त्वा । यज्ञा: । ब्रह्मऽपूता: । वहन्ति । अध्वऽगत: । हरय: । त्वा । वहन्ति ॥१.४३॥
अथर्ववेद » काण्ड:13» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:43
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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
जीवात्मा और परमात्मा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (द्याम्) प्रकाश के ऊपर (आरोहन्) चढ़ता हुआ (अमृतः) अमर तू (मे वचः) मेरे वचन को (प्र) भले प्रकार (अव) सुन। [हे परमेश्वर !] (त्वा) तुझको (ब्रह्मपूताः) ब्रह्माओं [वेदवेत्ताओं] द्वारा शुद्ध किये गये (यज्ञाः) यज्ञ [संगतियोग्य व्यवहार] (उत्) उत्तमता से (वहन्ति) प्राप्त होते हैं, (अध्वगतः) [वेदविहित] मार्ग पर चलनेवाले (हरयः) मनुष्य (त्वा) तुझको (वहन्ति) पाते हैं ॥४३॥
भावार्थभाषाः - योगी जन प्रकाशस्वरूप जगदीश्वर का ध्यान करके तपश्चरण के साथ उसे प्राप्त करके आनन्द पाते हैं ॥४३॥इस मन्त्र का उत्तर भाग ऊपर मन्त्र ३६ में आ चुका है ॥
टिप्पणी: ४३−(आरोहन्) अधितिष्ठन् (द्याम्) गमेर्डोः। उ० २।६७। द्युत दीप्तौ, यद्वा द्यु अभिगमने−डोस्। दीप्तिम् (अमृतः) अमरः। अविनाशी परमेश्वरः (प्र) प्रकर्षेण (अव) अव रक्षणश्रवणादिषु। शृणु (मे) मम (वचः) वचनम्। अन्यत् पूर्ववत् म० ३६ ॥
