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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
जीवात्मा और परमात्मा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे परमेश्वर !] (देवः) विद्वान् तू (देवान्) उत्तम गुणों को (मर्चयसि) बतलाता है, (अर्णवे अन्तः) समुद्र [संसार] के बीच (चरसि) तू विचरता है। (समानम्) समान [एकरस] (तम्) उस (अग्निम्) ज्ञानवान् [परमेश्वर] को (परे) बड़े (कवयः) बुद्धिमान् लोग (विदुः) जानते हैं और (इन्धते) प्रकाशित होते हैं ॥४०॥
भावार्थभाषाः - जो परमेश्वर संसार में व्यापक रहकर सदा शुभ गुणों का उपदेश करता है, बुद्धिमान् लोग उसी का उपदेश करके संसार में यश पावें ॥४०॥
टिप्पणी: ४०−(देवः) बुद्धिमान् (देवान्) दिव्यगुणान् (मर्चयसि) मर्च शब्दे। शब्दयसि। उपदिशसि (अन्तः) मध्ये (चरसि) विचरसि (अर्णवे) समुद्रे (समानम्) सामान्यम् (अग्निम्) ज्ञानवन्तं परमेश्वरम् (इन्धते) दीप्यन्ते (तम्) प्रसिद्धम् (विदुः) जानन्ति (कवयः) मेधाविनः-निघ० ३।१५। (परे) श्रेष्ठाः ॥
