जीवात्मा और परमात्मा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (रोहितः) सबके उत्पन्न करनेवाले [परमेश्वर] ने (रुहः) सृष्टि की सामग्रियों को (रुरोह) उत्पन्न किया, और (जनीनाम्) उत्पन्न करने की शक्तियों का (गर्भः) गर्भ [आधार वह परमेश्वर] (जनुषाम्) उत्पन्न होनेवाले पदार्थों की (उपस्थम्) गोद में (आ रुरोह) चढ़ गया। (ताभिः) उन [उत्पन्न करनेवाली शक्तियों] से (संरब्धम्) मिले हुए [उस परमेश्वर] को (षट्) छह [ऊपर, नीचे, पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर] (उर्वीः) चौड़ी [दिशाओं] ने (अनु) निरन्तर (अविन्दन्) पाया है, (गातुम्) मार्ग (प्रपश्यन्) आगे देखते हुए उस [परमेश्वर ने] (इह) यहाँ पर (राष्ट्रम्) अपना राज्य (आ) सब ओर से (अहाः) अङ्गीकार किया है ॥४॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर सब सृष्टि के पदार्थों का उत्पादक और नियन्ता होकर और दूर और समीप सब स्थान में वर्तमान रहकर राज्य करता है ॥४॥इस मन्त्र में (रुह) धातु से बने शब्दों में अनुप्रास अलङ्कार है ॥