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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
जीवात्मा और परमात्मा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे परमेश्वर !] (अमुत्र) वहाँ पर (सन्) रहता हुआ तू (इह) यहाँ (वेत्थ) जानता है, (इतः) इधर (सन्) रहता हुआ (तानि) उन [वस्तुओं] को (पश्यसि) देखता है। (इतः) यहाँ से (दिवि) प्रत्येक व्यवहार में (रोचनम्) चमकनेवाले (विपश्चितम्) बुद्धिमान् (सूर्यम्) सबके चलानेवाले [परमेश्वर] को (पश्यन्ति) वे [विद्वान्] देखते हैं ॥३९॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर समीप और दूर से सर्वव्यापी होकर सर्वनियन्ता है, ऐसा विचार कर बुद्धिमान् लोग अपने व्यवहारों में उन्नति करते हैं ॥३९॥
टिप्पणी: ३९−(अमुत्र) तत्र। दूरदेशे (सन्) वर्तमानः सन् (इह) अत्र (वेत्थ) जानासि (इतः) अत्र (सन्) (तानि) दूरस्थानि वस्तूनि (पश्यसि) निरीक्षसे (इतः) (पश्यन्ति) अवलोकयन्ति (रोचनम्) प्रकाशमानम् (दिवि) प्रत्येकव्यवहारे (सूर्यम्) सर्वप्रेरकं परमेश्वरम् (विपश्चितम्) मेधाविनम्-निघ० ३।१५ ॥
