जीवात्मा और परमात्मा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (वसुजिति) निवासस्थानों के जीतनेवाले (गोजिति) विद्याओं के जीतनेवाले (संधनाजिति) संपूर्ण धन के जीतनेवाले (रोहिते) सबके उत्पन्न करनेवाले [परमेश्वर] में (द्यावापृथिवी) सूर्य और पृथिवी (अधि) अधिकारपूर्वक (श्रिते) ठहरे हुए हैं। (यस्य) जिस [परमेश्वर] के (सहस्रम्) सहस्र [असंख्य] (जनिमानि) उत्पन्न करने के कर्म (च) निश्चय करके (सप्त) सात [त्वचा, नेत्र, कान, जिह्वा, नाक, मन और बुद्धि] के साथ हैं, [हे परमेश्वर !] (ते) तेरे (नाभिम्) सम्बन्ध को (भुवनस्य) संसार के (मज्मनि) बल के भीतर (अधि) अधिकारपूर्वक (वोचेयम्) मैं बतलाऊँ ॥३७॥
भावार्थभाषाः - वह सर्वव्यापक सर्वशक्तिमान् परमेश्वर सब लोकों का स्वामी है, उसने शरीरों को इन्द्रियों सहित बनाया है, उसी को जितेन्द्रिय योगी जन प्राप्त होकर सुखी होते हैं ॥३७॥इस मन्त्र का अन्तिम पाद ऊपर मन्त्र १४ में आया है ॥