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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
जीवात्मा और परमात्मा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे परमेश्वर !] (त्वा) तुझको (ब्रह्मपूताः) ब्रह्माओं [वेदवेत्ताओं] द्वारा शुद्ध किये गये (यज्ञाः) यज्ञ [संगतियोग्य व्यवहार] (उत्) उत्तमता से (वहन्ति) प्राप्त होते हैं, (अध्वगतः) [वेदविहित] मार्ग पर चलनेवाले (हरयः) मनुष्य (त्वा) तुझको (वहन्ति) पाते हैं। (अर्णवम्) जल से भरे (समुद्रम्) समुद्र को (तिरः) तिरस्कार करके तू (अति) अत्यन्त करके (रोचसे) प्रकाशमान होता है ॥३६॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर में सब पदार्थ व्याप्त हैं, वेदानुयायी पुरुष बहुत खोज कर अगम्य स्थानों में भी पाकर आनन्दित होते हैं ॥३६॥
टिप्पणी: ३६−(उत्) उत्तमतया (त्वा) परमात्मानम् (यज्ञाः) संगतियोग्यव्यवहाराः (ब्रह्मपूताः) वेदवेत्तृभिः शोधिताः (वहन्ति) प्राप्नुवन्ति (अध्वगतः) वेदविहितमार्गगन्तारः (हरयः) मनुष्याः-निघ० २।३। (त्वा) (वहन्ति) (तिरः) तिरस्कृत्य (समुद्रम्) समुद्रवदगम्यम् (अति) अत्यन्तम् (रोचसे) दीप्यसे (अर्णवम्) जलपूर्णम् ॥
