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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
जीवात्मा और परमात्मा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (देव) हे विजय चाहनेवाले ! (सूर्य) हे सर्वप्रेरक राजन् ! (उद्यन् त्वम्) ऊँचा चढ़ता हुआ तू (मे) मेरे (सपत्नान्) वैरियों को (अव जहि) मार गिरा। (एनान्) इन [शत्रुओं] को (अश्मना) पत्थर [आदि गिराने] से (अव जहि) मार गिरा, (ते) वे लोग (अधमम्) बड़े नीचे (तमः) अन्धकार में (यन्तु) जावें ॥३२॥
भावार्थभाषाः - राजा को योग्य है कि न्यायव्यवहार में प्रकाशमान होकर शत्रुओं को यथापराध दण्ड देकर कारागार में पीड़ा देवें ॥३२॥
टिप्पणी: ३२−(उद्यन्) उद्गच्छन् (त्वम्) (देव) विजिगीषो (सूर्य) सर्वप्रेरक राजन् (सपत्नान्) (मे) मम (अव जहि) विनाशय (एनान्) सपत्नान् (अश्मना) प्रस्तरादिना (अवजहि) (ते) शत्रवः (यन्तु) गच्छन्तु (अधमम्) अतिनिकृष्टम् (तमः) अन्धकारम् ॥
